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: शाला प्रवेश उत्सव या पैसा उगाही उत्सव ? 35 हस्ताक्षर, एक ज्ञापन और वसूली का ठप्पा, किताबें कम, धमकी ज़्यादा, कलेक्टर से बोले- साहब हमें हटा दीजिए

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक में शिक्षा तंत्र का हाल देखिए—जहां बच्चों को किताबें और शिक्षक चाहिए थे, वहां बीआरसीसी साहब ने 'नोटबुक' की जगह नोट गिनने का धंधा शुरू कर रखा है। शाला प्रवेश उत्सव के नाम पर पैसा मांगना, प्रशिक्षण का खर्चा डलवाना और ऊपर से सवाल पूछो तो 'निलंबन' का डंडा दिखाना… ये है ब्लॉक रिसोर्स सेंटर का असली चेहरा।

कागज़ों में शिक्षा सुधार की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि 35 संकुल समन्वयक एक साथ कलेक्टर के दरवाज़े पर दस्तक देने को मजबूर हो गए। वजह साफ है—एक साहब की मनमानी और तानाशाही, जो पद पर तो नियम विरुद्ध बैठे हैं और ऊपर से पूरे सिस्टम को अपनी जेब का गुलाम समझ बैठे हैं।

अब सवाल यह है कि क्या ये तंत्र बच्चों का भविष्य सुधारने चला था, या फिर 'शिक्षा' सिर्फ एक नया ठेका बन गई है जहां घूस, धमकी और भ्रष्टाचार ही पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं? छुरा का यह संग्राम सिर्फ बीआरसीसी बनाम समन्वयक नहीं, बल्कि शिक्षा बनाम भ्रष्टाचार की जंग बन चुका है।

अब पढ़िए क्या है पूरा मामला ?

गरियाबंद ज़िले के छुरा विकासखंड में शिक्षा तंत्र पर एक बार फिर भ्रष्टाचार और मनमानी के आरोपों ने तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस बार निशाने पर खुद ब्लॉक रिसोर्स सेंटर कोऑर्डिनेटर (बीआरसीसी) हैं, जिनके खिलाफ छुरा के सभी 35 संकुल समन्वयक लामबद्ध हो गए हैं।

मंगलवार को संकुल समन्वयकों के प्रतिनिधि मंडल ने कलेक्टर भगवान सिंह यूईके को हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन सौंपकर बीआरसीसी एच.के. देवांगन की कार्यप्रणाली को भ्रष्ट और तानाशाही करार दिया। समन्वयकों का कहना है कि देवांगन की वजह से वे मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से परेशान हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि उन्होंने साफ चेतावनी दी है—जब तक देवांगन को उनके मूल पद पर फिंगेश्वर नहीं भेजा जाएगा, तब तक कार्य बहिष्कार जारी रहेगा।

मनमानी और धमकी का आरोप

ज्ञापन में विस्तार से दर्ज शिकायतों ने प्रशासनिक ढांचे की पोल खोल दी है। समन्वयकों का आरोप है कि—शाला प्रवेश उत्सव के नाम पर उनसे पैसे की अवैध मांग की जाती है। प्रशिक्षण के लिए पहले से आबंटन मिलने के बावजूद, ब्लॉक स्तर की गतिविधियों को जोन स्तर पर करवाकर खर्च का बोझ समन्वयकों पर डाला जाता है।

बैठकों को ऑनलाइन कराया जाता है, जिससे आधी-अधूरी जानकारी ही मिल पाती है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि जब भी कोई सवाल पूछता है या विरोध दर्ज करता है, तो उसे निलंबन की धमकी दी जाती है। स्पष्ट है कि यह सब शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में चल रहे भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

नियम विरुद्ध नियुक्ति भी सवालों के घेरे में

संकुल समन्वयकों ने यह भी उजागर किया कि बीआरसीसी एच.के. देवांगन की नियुक्ति ही नियम विरुद्ध है। देवांगन मूल रूप से फिंगेश्वर ब्लॉक के परसदा जोशी हाईस्कूल में लेक्चरर हैं, जबकि छुरा ब्लॉक के बीआरसीसी पद पर प्रधान पाठक या एलबी को नियुक्त किया जाना चाहिए था।

इस तरह नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्ति ने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। समन्वयकों ने मांग की है कि इस अवैध नियुक्ति को तत्काल निरस्त किया जाए और देवांगन को उनके मूल शैक्षणिक कार्य पर वापस भेजा जाए।

प्रशासन की सफाई और आगे की कार्रवाई

इस पूरे मामले में जिला स्रोत समन्वयक शिवेश शुक्ला ने पुष्टि की है कि शिकायत उन्हें भी प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा—“छुरा बीआरसीसी के विरुद्ध संकुल समन्वयकों ने लिखित शिकायत कलेक्टर महोदय को सौंपी है। उसकी एक प्रति मुझे भी दी गई है। कलेक्टर के निर्देशानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।”

शिक्षा तंत्र में ‘भ्रष्टाचार बनाम शिक्षाकर्मी’ की जंग

गरियाबंद में सामने आया यह प्रकरण सिर्फ एक व्यक्ति की मनमानी का मामला नहीं है, बल्कि यह शिक्षा तंत्र में फैले भ्रष्टाचार, दबंगई और ऊंची पहुंच के सहारे नियमों को दरकिनार करने की गंदी परंपरा की झलक भी है।

सवाल यह है कि— जब 35 में से सभी संकुल समन्वयक एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं, तब क्या यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी है या फिर सिस्टम में गहरी पैठा हुआ करप्शन?क्या शिक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में इस तरह की मनमानी को अनदेखा किया जाना चाहिए?

अब नज़रें प्रशासन पर हैं कि कलेक्टर और जिला शिक्षा विभाग इस ‘भ्रष्टाचार बनाम शिक्षाकर्मी’ की जंग में किसके पक्ष में खड़े होते हैं—जनहित और नियमों के, या फिर एक बार फिर किसी ऊंची पहुंच वाले अफसर के?

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