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: गरियाबंद के 60 साल के अजा की पाठशाला: सरकारी स्कूलों से ज्यादा टैलेंटेड हैं इनके स्टूडेंट्स, जानिए कैसे 10 साल से जगा रहे शिक्षा की अलख ?

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में सरकारी स्कूलों की बदहाली और बदली शिक्षा व्यवस्था के बीच 60 वर्षीय दिवाधर बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रहे हैं। पिछले 10 सालों से वे रोजाना बच्चों को पढ़ा रहे हैं, ताकि उन्हें अच्छी शिक्षा मिल सके। वे अपने आंगन में शिक्षा की लौ जला रहे हैं।

Chhattisgarh Gariaband Sargibahli village's Diwadhar School Story: देवभोग तहसील के सरगीबहली गांव के दिवाधर कहते हैं कि वे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की मुहिम (Sargibahli village's Diwadhar School Story) चला रहे हैं। वे प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले 25 और छठी क्लास के 3 छात्रों को पढ़ा रहे हैं। बच्चे उन्हें प्यार से 'आजा' कहकर बुलाते हैं आजा की क्लास सुबह 7 से 9 और शाम को 5 से 6 बजे तक लगती है। आजा की क्लास नियमित चलती है। एक सप्ताह पहले साइकिल से गिरने के कारण उनका बायां पैर फ्रैक्चर (Sargibahli village's Diwadhar School Story) हो गया था। पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ है। इसके बावजूद क्लास बंद नहीं होती। कई बार बारिश के दिनों में क्लास बाधित हो जाती है। त्याग और सेवा 1965 में हायर सेकेंडरी की शिक्षा पूरी करने वाले दिवाधर गांधीजी को अपना आदर्श मानते हैं। 1973 में वे नुआगुड़ा प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के पद पर पदस्थ हुए, लेकिन उन्होंने (Sargibahli village's Diwadhar School Story) शिक्षक की नौकरी छोड़कर समाज सेवा शुरू कर दी। राजनीतिक सुर्खियों में नहीं आ सके, सरपंच चुने गए Chhattisgarh Gariaband Sargibahli village's Diwadhar School Story: वे गांव से थे, इसलिए राजनीतिक सुर्खियों में नहीं दिखे, लेकिन उनसे प्रभावित लोगों ने उन्हें पंचायत चुनाव में उतारा। 1979 में वे उसरीपानी के (Sargibahli village's Diwadhar School Story) सरपंच चुने गए। उन्होंने गांव में सड़क और बिजली पहुंचाई। कई गांवों में स्कूल खुलवाए Chhattisgarh Gariaband Sargibahli village's Diwadhar School Story: 1982 में जनपद पंचायत का चुनाव लड़ा। 1988 तक वे देवभोग जनपद के उपाध्यक्ष रहे। श्यामा विद्या जैसे राजनेताओं से संपर्क बढ़ा। उपाध्यक्ष रहते हुए (Sargibahli village's Diwadhar School Story) उन्होंने नदी पार के कई गांवों में स्कूल खुलवाए। आखिरी सांस तक शिक्षा के प्रसार के लिए काम करूंगा झाखरपारा में हाईस्कूल की स्थापना में भी चुरपाल का बड़ा योगदान रहा। दिवाधर चुरपाल का पूरा कार्यकाल निर्विवाद रहा। राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने के बाद पिछले 10 सालों से वे बच्चों को पढ़ा रहे हैं। चुरपाल कहते हैं कि मैं अपनी आखिरी सांस तक शिक्षा देता रहूंगा। Chhattisgarh Gariaband Sargibahli village's Diwadhar School Story: शिक्षा में यह बदलाव देखने को मिला आज भी गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्रों को अक्षर ज्ञान, गुणन सारणी, बारहखंडी जैसी बुनियादी जानकारी (Sargibahli village's Diwadhar School Story) नहीं है, लेकिन सरगी बहली गांव के बच्चे पड़ोसी गांवों से बेहतर हैं। Read More- Landmines, Tanks, Ruins: The Afghanista Taliban Left Behind in 2001 29 IAS-IPS

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