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: PM मोदी के सपनों पर पलीता: 100 साल से बूंद-बूंद पानी को तरसता गांव, वोट बैंक बनकर रह गए ग्रामीण, झिरिया का गंदा पानी पीने को बेबस, साहब कौन सुनेगा गुहार ?

गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में कई ऐसे गांव हैं, जहां लोग वर्षों से बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं. इन दिनों ग्रामीण पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. गर्मी की दस्तक के साथ ही पेयजल की समस्या विकराल हो गई है. जल जीवन मिशन योजना शो पीस बनकर रह गई है. ऐसे में सरकार और विभाग का दावा छलावा साबित होता नजर आ रहा है. पेयजल संकट गहराने लगा है. गर्मी से परेशान लोग पानी के लिए भटकने लगे हैं. सरकारी अफसर स्वीकृति के बाद भी लोगों को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसा रहे हैं. ग्रामीण झिरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं.

दरअसल, एक हजार की आबादी वाले गांव में पहले से मौजूद सभी हैंडपंपों में लोहे की मात्रा मानक से अधिक है. दाल और चावल पानी से नहीं पकते हैं. बच्चों के दांत भी पीले होने लगे हैं. कई सालों से लोग तेल नदी का पानी पीकर अपना गुजारा कर रहे हैं. ब्लॉक मुख्यालय से 6 किमी की दूरी पर स्थित तेल नदी के तट पर स्थित पूर्णापानी गांव के सभी ग्रामीण आज भी तेल नदी के पानी का उपयोग पीने और खाने के लिए करते हैं. ब्लॉक मुख्यालय से 6 किमी की दूरी पर तेल नदी के किनारे बसे पूर्णापानी गांव के सभी ग्रामीण आज भी तेल नदी के पानी का इस्तेमाल पीने और खाने के लिए करते हैं. 12 महीने तक महिलाएं नदी से झरिया खोदकर पानी लेती हैं. सुबह 5:00 से 8:00 बजे तक और शाम को 4:00 से 6:00 बजे तक पानी लेने के लिए महिलाओं की भीड़ लगी रहती है. ग्राम प्रधान मनीराम हिमांचल निधि ने बताया कि गांव 100 साल से अधिक पुराना है, यहां के पानी में शुरू से ही आयरन की मात्रा अधिक है. पिता और दादा के जमाने में पानी से दाल नहीं पकाई जाती थी. चावल पीले पड़ जाते थे. बच्चों के दांत पीले होने लगे तो गांव से 1 किमी दूर बहने वाली तेल नदी में बड़े-बुजुर्गों ने झरिया खोदकर पीने के पानी के उपयोग में लाना शुरू किया, जो आज भी कायम है. एक साल बाद भी नहीं शुरू हो सका जल जीवन मिशन का काम जल जीवन मिशन के तहत पूर्णापानी गांव में एकल ग्राम योजना के तहत 1.9 करोड़ स्वीकृत, 285 कनेक्शन के जरिए पूरे गांव के हर घर में स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है . इसके लिए 29 मार्च 2023 को अनुबंध भी हो गया है, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ. गांव के उप सरपंच सुशील निधि ने बताया कि 5 साल पहले पीचै विभाग ने गांव के सभी हैंडपंपों की जांच की थी, सभी में अनुपात से अधिक आयरन की मात्रा पाई गई, विभाग ने पानी पीने से मना किया था. स्कूल में रिमूवल प्लांट भी लगाया. अब विभाग नई योजना के तहत गांव के स्रोत से पानी उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है, जो पानी हम उपयोग नहीं करते हैं वह घर-घर पहुंचा दिया जाए तो क्या फायदा. हमारी मांग है कि गांव के बाहर नदी के पास सप्लाई का जरिया बनाकर हर घर में आयरन किया जाए। मुफ्त पानी देना चाहिए. अधिकारियों से मार्गदर्शन ले रहे हैं मामले में पीएचई विभाग के एसडीओ जागेश्वर मरकाम ने बताया कि ग्रामीणों की मांगों से उच्च कार्यालय को अवगत करा दिया गया है, वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन लिया जा रहा है, निर्देशानुसार आगे की कार्रवाई की जायेगी. read more- Landmines, Tanks, Ruins: The Afghanistan Taliban Left Behind in 2001 29 IAS-IPS

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