विस्थापन से पहले विवाद में घिरा देवझरअमली गांव : गरियाबंद में 36 परिवारों ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, बोले-जल-जंगल-जमीन नहीं छोड़ेंगे
MP CG Times / Sat, Sep 19, 2026
गिरीश जगत, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के उदंती-सीतानदी अभयारण्य क्षेत्र में विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मामला विवादों में घिर गया है। ग्रामीणों ने अभयारण्य प्रशासन पर विस्थापन के लिए लोगों को तैयार करने और उकसाने का आरोप लगाया है। ग्राम देवझरअमली के 36 परिवारों का प्रतिनिधिमंडल कलेक्टर रणवीर शर्मा से मिला और ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखीं।
कलेक्टर ने बताया कि विस्थापन को लेकर 21 सितंबर को जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक होगी। बैठक में गांव के लोगों को भी आमंत्रित किया गया है। इसमें जो निर्णय होगा, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

17 सितंबर की बैठक के बाद बढ़ा विवाद
ग्रामीणों के अनुसार, 17 सितंबर को अभयारण्य के उपनिदेशक के साथ कलेक्टर गांव पहुंचे थे। वहां विस्थापन को लेकर बैठक की गई, जिसमें ग्रामीणों के एक छोटे समूह ने हिस्सा लिया। इसके बाद गांव के बड़े समूह और स्थानीय आदिवासी नेताओं ने प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि विस्थापन की पूरी प्रक्रिया पेसा कानून के तहत ग्रामसभा को मिले अधिकारों के अनुसार की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में मौजूद सैकड़ों एकड़ जमीन की वैधानिक स्थिति, विस्थापन का आधार, नियम-शर्तें, पुनर्वास और मिलने वाले पैकेज समेत पूरी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। उनका कहना है कि जब तक इन मुद्दों पर स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती, तब तक विरोध जारी रहेगा।

ग्रामीण बोले- विस्थापन नहीं, गांव में विकास चाहिए
जिला पंचायत सदस्य संजय नेताम और लोकेश्वरी नेताम ने कहा कि ग्राम देवझरअमली में करीब 156 परिवार रहते हैं। इनमें से 36 परिवारों ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वे अपने पुरखों की जगह और जल-जंगल-जमीन छोड़कर नहीं जाना चाहते। उनके मुताबिक गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं है, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ा है।
ग्रामीण लंबे समय से सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, संचार और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि गांव में विकास की बात आने पर कई तरह की विभागीय अड़चनें बताई जाती हैं, जबकि विस्थापन के लिए परिवारों को जमीन और आर्थिक पैकेज की बातें बताई जा रही हैं।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब गांव में विकास के लिए बजट और सुविधाओं की कमी बताई जाती है, तो विस्थापन के नाम पर करोड़ों रुपए के पैकेज की बात क्यों हो रही है।

PESA और FRA के अधिकारों का मुद्दा
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह अनुसूचित क्षेत्र है और यहां PESA कानून तथा वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत ग्रामसभा की महत्वपूर्ण वैधानिक भूमिका है। उनके अनुसार ग्राम देवझरअमली को करीब 768.55 हेक्टेयर सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार प्राप्त है।
ग्रामीणों की मांग है कि यदि प्रशासन या वन विभाग विस्थापन को जरूरी मानता है, तो उसका विधिक आधार, संबंधित दस्तावेज, पुनर्वास पैकेज, ग्रामीणों के अधिकारों की स्थिति और कानून में तय प्रक्रिया ग्रामसभा व प्रभावित परिवारों के सामने स्पष्ट की जाए। जनप्रतिनिधियों ने कहा कि ग्रामीण वन्यजीव संरक्षण के विरोध में नहीं हैं। वे संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच कानून के अनुसार न्यायपूर्ण व्यवस्था चाहते हैं।
21 सितंबर की बैठक में तय होगी आगे की दिशा
कलेक्टर रणवीर शर्मा ने कहा कि विस्थापन को लेकर 21 सितंबर को जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक बुलाई गई है। इसमें संबंधित गांव के लोगों को भी आमंत्रित किया गया है। बैठक में जो निर्णय सामने आएगा, आगे की कार्रवाई उसी के आधार पर की जाएगी।
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