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: Historical Discovery: एएसआई ने की बड़ी खोज, बांधवगढ़ में मिलीं 2 हजार साल पुरानी 26 मानव निर्मित गुफाएं

News Desk / Tue, Sep 27, 2022


एएसआई ने की बड़ी खोज

एएसआई ने की बड़ी खोज - फोटो : सोशल मीडिया

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भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम ने मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ में इस साल एक खोज अभियान के तहत कई प्राचीन चीजों को डिस्कवर किया है। आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के जबलपुर सर्किल के अधिकारी शिवाकांत वाजपेई के मुताबिक, बाधवगढ़ का टाइगर रिजर्व 1100 एसक्यू मीटर एरिया में फैला है। अभी एक जोन तलागर में सर्च अभियान चला है, जिसमे 26 गुफाएं मिली हैं। ये गुफाएं चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। इनमें कुछ महायान बौद्ध धर्म से जुड़ी हैं। गुफाओं के साथ ही 24 अभिलेख ब्राह्मी और अन्य भाषाओं में मिल हैं, इनमें मथुरा और कौशाम्बी के नाम का भी जिक्र है।

शिवाकांत वाजपेई ने कहा, कई गुफाएं इतनी बड़ी हैं कि इनमें 30 से 40 लोग एक साथ रह सकते हैं। 26 मंदिर और उनके अवशेष भी खोजे गए हैं। बोर्ड गेम, जिसमें लोग गोटियों का खेल खेलते थे वो अवशेष भी मिले हैं। लेटे हुए विष्णु और वराह की मूर्तियां भी मिलीं हैं। अभी हम ताला रेंज के एरिया को ही सर्च कर पाए हैं। उन्होंने बताया, बाधवगढ़ में काम करना आसान नहीं होता है, ये पूरा टाइगर रिज़र्व है। लिहाजा फॉरेस्ट विभाग से परमिशन लेकर यहां पर अभियान चलाया गया।

इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता...
आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से इसका विवरण देते हुए बताया गया कि मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के विंध्य पर्वत श्रृंखला और सतपुड़ा पहाड़ी श्रृंखला के पूर्वी किनारे के मध्य में स्थित बांधवगढ़ प्रमुख रूप से अपने टाइगर रिजर्व के लिए जाना जाता है। लेकिन इस क्षेत्र में उपस्थित एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वह है, बांधवगढ़ की पुरातत्व विरासत। फेल्डस्पैथिक बलुआ पत्थर और कई बारहमासी नालों के साथ दलदली और घने वन घाटी ने इस जगह को न केवल जानवरों के लिए उपयुक्त आवास स्थान बना दिया, बल्कि यह मानव निवास के लिए भी एक आदर्श स्थान बन गया।

बांधवगढ़ की एक प्राचीन पुरातात्विक पृष्ठभूमि है, लेकिन इस क्षेत्र का समुचित सर्वेक्षण लंबे समय तक नहीं हो पाया। बांधवगढ़ का अर्थ पौराणिक महत्व का है। यह स्थल नारद पंचरात्र और शिव पुराण में उल्लेखित है। ऐसा माना जाता है, भगवान श्री राम ने अयोध्या लौटते समय अपने छोटे भाई लक्ष्मण को यह क्षेत्र उपहार में दिया था।

लंबे समय तक मघ राजवंश के अधीन था क्षेत्र...
अभी तक सर्वेक्षणों में प्राप्त अवशेषों से बांधवगढ़ का लिखित इतिहास कम से कम दूसरी शताब्दी ईस्वी तक का माना जाता है। इस क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखों से स्पष्ट है कि यह बहुत लंबे समय तक मघ राजवंश के अधीन था। मघ राजाओं तथा व्यापारियों के नाम यहां पर उत्कीर्ण ब्राह्मी शिलालेखों में पाए गए हैं। यहां के अभिलेखों में निम्न स्थानों का भी उल्लेख मिलता है, उनमें कौशाम्बी, मथुरा, पवत (पर्वत), वेजभरदा, सपतनाइरिका शामिल हैं।

महत्वपूर्ण शासकों के नाम का भी उल्लेख आया है, इनमें महाराजा श्री भीमसेन, महाराजा पोथसिरी और महाराजा भट्टदेव शामिल हैं। बांधवगढ़ में स्थित मानव निर्मित गुफाओं में ब्राह्मी लिपि के कई शिलालेख मिले हैं, जो दूसरी शताब्दी ईस्वी से पांचवी शताब्दी ईस्वी तक के हैं। इसके अतिरिक्त बांधवगढ़ से मघ राजवंश के और अन्य सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

मघ राजवंश के बाद कई अन्य राजवंशों ने भी किया शासन...
मघ राजवंश के बाद यहां कई अन्य राजवंशों ने शासन किया, जिनमें गुप्त शासक परवर्ती गुप्त शासक एवं प्रतिहार शामिल हैं। कालांतर में कलचुरियों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कलचुरियों के शासन को इस क्षेत्र का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। वस्तुतः इस क्षेत्र में बाघों के प्राचीन काल से मिलने के कारण इसे बघेलखंड के नाम से भी जाना जाता है और बाद में यहां शासन करने वाले शासक भी बघेल शासकों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस दुर्ग पर शासन करने वाला बघेल राजवंश अंतिम राजवंश था, जिसका इस दुर्ग पर आजादी के बाद (1969) तक आधिपत्य रहा।

बघेलखंड में कलचुरियों का आगमन 9वीं शताब्दी में हुआ था। त्रिपुरी के कलचुरी बांधवगढ़ के प्रमुख शासक थे। उन्होंने बांधवगढ़ जंगल के आसपास बड़ी संख्या में मंदिरों और प्रतिमाओं का निर्माण किया है। शेषशायी विष्णु की विशाल प्रतिमा और विष्णु के अवतार की अन्य प्रतिमाएं, गणेश की प्रतिमा, मंदिर आदि कलचुरी काल से जुड़े हुए हैं। बांधवगढ़ से कलचुरी राजा युवराजदेव-प्रथम के विभिन्न शिलालेख प्राप्त हुए हैं।

त्रिपुरी के कलचुरी के बाद बांधवगढ़ रतनपुर के कलचुरियों के शासन में आ गया। 13वीं शताब्दी में रतनपुर के राजा सोम-दत्त ने अपनी बेटी का विवाह बघेल साम्राज्य के राजा कर्ण देव से किया और बांधवगढ़ किला अपनी बेटी के दहेज के रूप में दे दिया। बांधवगढ़ बाद के राजवंशों के लिए भी सबसे वांछनीय स्थानों में से एक रहा है।

बांधवगढ़ दुर्ग का मध्यकालीन भारत में महत्व...
अकबर ने बांधवगढ़ (किला बंधु) के नाम से एक सिक्का जारी किया था। वर्तमान में बहुत सारे मध्यकालीन मंदिर/छत्रियां यहां स्थित हैं, जो बघेल वास्तुकला की झलक प्रस्तुत करती हैं। इसके अतिरिक्त बांधवगढ़ दुर्ग का मध्यकालीन समय में सामरिक महत्व के साथ-साथ सामाजिक महत्व भी था। संत कबीर बांधवगढ़ के प्रवास पर आए थे तथा उनके प्रमुख शिष्य धर्मदास भी बांधवगढ़ के ही निवासी थे। ऐसा माना जाता है कि संत कबीर बांधवगढ़ संवत 1570 ई. में बांधवगढ़ आए थे। कबीरदास के बांधवगढ़ आगमन के बाद से यहां सलाम साहब शब्द का चलन बढ़ गया तथा आज वर्तमान में भी इस क्षेत्र में यह शब्द बड़ी संख्या में बोला जाता है। वर्तमान में बांधवगढ़ में स्थित कबीर मंदिर एवं तालाब इसकी प्रामाणिकता प्रस्तुत करते हैं।

प्रथम प्रमुख अन्वेषण...
बांधवगढ़ का प्रथम प्रमुख अन्वेषण डॉ. एनपी चक्रवर्ती, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा साल 1938 में किया था। डॉ. चक्रवर्ती ने मुख्य रूप से शिलालेखों पर केंद्रित अन्वेषण एवं अभिलेखीकरण का कार्य किया था, जिसके कारण गुहा वास्तुकला के बारे में अधिक जानकारी सामने नहीं आई। तब से इस क्षेत्र में कुछ छोटे अन्वेषण या शोध किए गए हैं। कुछ पुस्तकों में मंदिरों और गुफाओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनमें उन पुरावशेषों/स्मारकों का विवरण उपलब्ध नहीं हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आस-पास विभिन्न संस्थानों और विद्वानों ने शोधकार्य किया है, लेकिन अभी तक कोई भी महत्वपूर्ण रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

बांधवगढ़ में समुचित अन्वेषण नहीं होने का कारण बहुत स्पष्ट है, जब यह जंगल बघेल साम्राज्य के अधीन था, तब भी विद्वानों को अध्ययन के उद्देश्य से बहुत अधिक अनुमति नहीं दी गई थी। डॉ चक्रवर्ती ने बघेल राजा की अनुमति से सर्वेक्षण किया, क्योंकि बाहरी व्यक्ति के लिए किले क्षेत्र का निरीक्षण करने या जाने की अनुमति का प्रावधान नहीं था।  डॉ. चक्रवर्ती के साथ केसरी सिंह, हेड कांस्टेबल (मार्च 1938) को रीवा राज्य ने प्रतिनियुक्त किया था। एपिग्राफिया इंडिका XXXI में डॉ. चक्रवर्ती ने बांधवगढ़ के शिलालेखों को प्रकाशित किया है तथा डॉ. मिराशी ने कलचुरी-चेदि युग के शिलालेख में बांधवगढ़ के नागरी शिलालेख को भी प्रकाशित किया है।

हाल ही साल 2020 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जबलपुर मण्डल की स्थापना हुई, जिसके बाद इस बात पर जोर दिया गया कि बांधवगढ़ वन क्षेत्र में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में अधो हस्ताक्षरकर्ता डॉ. शिवाकान्त बाजपेई, अधीक्षण पुरातत्वविद, जबलपुर मण्डल के निर्देशन में निम्नानुसार सर्वेक्षण दल का गठन किया गया। 

विस्तार

भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम ने मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ में इस साल एक खोज अभियान के तहत कई प्राचीन चीजों को डिस्कवर किया है। आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के जबलपुर सर्किल के अधिकारी शिवाकांत वाजपेई के मुताबिक, बाधवगढ़ का टाइगर रिजर्व 1100 एसक्यू मीटर एरिया में फैला है। अभी एक जोन तलागर में सर्च अभियान चला है, जिसमे 26 गुफाएं मिली हैं। ये गुफाएं चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। इनमें कुछ महायान बौद्ध धर्म से जुड़ी हैं। गुफाओं के साथ ही 24 अभिलेख ब्राह्मी और अन्य भाषाओं में मिल हैं, इनमें मथुरा और कौशाम्बी के नाम का भी जिक्र है।

शिवाकांत वाजपेई ने कहा, कई गुफाएं इतनी बड़ी हैं कि इनमें 30 से 40 लोग एक साथ रह सकते हैं। 26 मंदिर और उनके अवशेष भी खोजे गए हैं। बोर्ड गेम, जिसमें लोग गोटियों का खेल खेलते थे वो अवशेष भी मिले हैं। लेटे हुए विष्णु और वराह की मूर्तियां भी मिलीं हैं। अभी हम ताला रेंज के एरिया को ही सर्च कर पाए हैं। उन्होंने बताया, बाधवगढ़ में काम करना आसान नहीं होता है, ये पूरा टाइगर रिज़र्व है। लिहाजा फॉरेस्ट विभाग से परमिशन लेकर यहां पर अभियान चलाया गया।

इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता...
आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से इसका विवरण देते हुए बताया गया कि मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के विंध्य पर्वत श्रृंखला और सतपुड़ा पहाड़ी श्रृंखला के पूर्वी किनारे के मध्य में स्थित बांधवगढ़ प्रमुख रूप से अपने टाइगर रिजर्व के लिए जाना जाता है। लेकिन इस क्षेत्र में उपस्थित एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वह है, बांधवगढ़ की पुरातत्व विरासत। फेल्डस्पैथिक बलुआ पत्थर और कई बारहमासी नालों के साथ दलदली और घने वन घाटी ने इस जगह को न केवल जानवरों के लिए उपयुक्त आवास स्थान बना दिया, बल्कि यह मानव निवास के लिए भी एक आदर्श स्थान बन गया।

बांधवगढ़ की एक प्राचीन पुरातात्विक पृष्ठभूमि है, लेकिन इस क्षेत्र का समुचित सर्वेक्षण लंबे समय तक नहीं हो पाया। बांधवगढ़ का अर्थ पौराणिक महत्व का है। यह स्थल नारद पंचरात्र और शिव पुराण में उल्लेखित है। ऐसा माना जाता है, भगवान श्री राम ने अयोध्या लौटते समय अपने छोटे भाई लक्ष्मण को यह क्षेत्र उपहार में दिया था।

लंबे समय तक मघ राजवंश के अधीन था क्षेत्र...
अभी तक सर्वेक्षणों में प्राप्त अवशेषों से बांधवगढ़ का लिखित इतिहास कम से कम दूसरी शताब्दी ईस्वी तक का माना जाता है। इस क्षेत्र से प्राप्त अभिलेखों से स्पष्ट है कि यह बहुत लंबे समय तक मघ राजवंश के अधीन था। मघ राजाओं तथा व्यापारियों के नाम यहां पर उत्कीर्ण ब्राह्मी शिलालेखों में पाए गए हैं। यहां के अभिलेखों में निम्न स्थानों का भी उल्लेख मिलता है, उनमें कौशाम्बी, मथुरा, पवत (पर्वत), वेजभरदा, सपतनाइरिका शामिल हैं।


महत्वपूर्ण शासकों के नाम का भी उल्लेख आया है, इनमें महाराजा श्री भीमसेन, महाराजा पोथसिरी और महाराजा भट्टदेव शामिल हैं। बांधवगढ़ में स्थित मानव निर्मित गुफाओं में ब्राह्मी लिपि के कई शिलालेख मिले हैं, जो दूसरी शताब्दी ईस्वी से पांचवी शताब्दी ईस्वी तक के हैं। इसके अतिरिक्त बांधवगढ़ से मघ राजवंश के और अन्य सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

मघ राजवंश के बाद कई अन्य राजवंशों ने भी किया शासन...
मघ राजवंश के बाद यहां कई अन्य राजवंशों ने शासन किया, जिनमें गुप्त शासक परवर्ती गुप्त शासक एवं प्रतिहार शामिल हैं। कालांतर में कलचुरियों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कलचुरियों के शासन को इस क्षेत्र का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। वस्तुतः इस क्षेत्र में बाघों के प्राचीन काल से मिलने के कारण इसे बघेलखंड के नाम से भी जाना जाता है और बाद में यहां शासन करने वाले शासक भी बघेल शासकों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इस दुर्ग पर शासन करने वाला बघेल राजवंश अंतिम राजवंश था, जिसका इस दुर्ग पर आजादी के बाद (1969) तक आधिपत्य रहा।

बघेलखंड में कलचुरियों का आगमन 9वीं शताब्दी में हुआ था। त्रिपुरी के कलचुरी बांधवगढ़ के प्रमुख शासक थे। उन्होंने बांधवगढ़ जंगल के आसपास बड़ी संख्या में मंदिरों और प्रतिमाओं का निर्माण किया है। शेषशायी विष्णु की विशाल प्रतिमा और विष्णु के अवतार की अन्य प्रतिमाएं, गणेश की प्रतिमा, मंदिर आदि कलचुरी काल से जुड़े हुए हैं। बांधवगढ़ से कलचुरी राजा युवराजदेव-प्रथम के विभिन्न शिलालेख प्राप्त हुए हैं।

त्रिपुरी के कलचुरी के बाद बांधवगढ़ रतनपुर के कलचुरियों के शासन में आ गया। 13वीं शताब्दी में रतनपुर के राजा सोम-दत्त ने अपनी बेटी का विवाह बघेल साम्राज्य के राजा कर्ण देव से किया और बांधवगढ़ किला अपनी बेटी के दहेज के रूप में दे दिया। बांधवगढ़ बाद के राजवंशों के लिए भी सबसे वांछनीय स्थानों में से एक रहा है।

बांधवगढ़ दुर्ग का मध्यकालीन भारत में महत्व...
अकबर ने बांधवगढ़ (किला बंधु) के नाम से एक सिक्का जारी किया था। वर्तमान में बहुत सारे मध्यकालीन मंदिर/छत्रियां यहां स्थित हैं, जो बघेल वास्तुकला की झलक प्रस्तुत करती हैं। इसके अतिरिक्त बांधवगढ़ दुर्ग का मध्यकालीन समय में सामरिक महत्व के साथ-साथ सामाजिक महत्व भी था। संत कबीर बांधवगढ़ के प्रवास पर आए थे तथा उनके प्रमुख शिष्य धर्मदास भी बांधवगढ़ के ही निवासी थे। ऐसा माना जाता है कि संत कबीर बांधवगढ़ संवत 1570 ई. में बांधवगढ़ आए थे। कबीरदास के बांधवगढ़ आगमन के बाद से यहां सलाम साहब शब्द का चलन बढ़ गया तथा आज वर्तमान में भी इस क्षेत्र में यह शब्द बड़ी संख्या में बोला जाता है। वर्तमान में बांधवगढ़ में स्थित कबीर मंदिर एवं तालाब इसकी प्रामाणिकता प्रस्तुत करते हैं।

प्रथम प्रमुख अन्वेषण...
बांधवगढ़ का प्रथम प्रमुख अन्वेषण डॉ. एनपी चक्रवर्ती, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा साल 1938 में किया था। डॉ. चक्रवर्ती ने मुख्य रूप से शिलालेखों पर केंद्रित अन्वेषण एवं अभिलेखीकरण का कार्य किया था, जिसके कारण गुहा वास्तुकला के बारे में अधिक जानकारी सामने नहीं आई। तब से इस क्षेत्र में कुछ छोटे अन्वेषण या शोध किए गए हैं। कुछ पुस्तकों में मंदिरों और गुफाओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनमें उन पुरावशेषों/स्मारकों का विवरण उपलब्ध नहीं हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आस-पास विभिन्न संस्थानों और विद्वानों ने शोधकार्य किया है, लेकिन अभी तक कोई भी महत्वपूर्ण रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

बांधवगढ़ में समुचित अन्वेषण नहीं होने का कारण बहुत स्पष्ट है, जब यह जंगल बघेल साम्राज्य के अधीन था, तब भी विद्वानों को अध्ययन के उद्देश्य से बहुत अधिक अनुमति नहीं दी गई थी। डॉ चक्रवर्ती ने बघेल राजा की अनुमति से सर्वेक्षण किया, क्योंकि बाहरी व्यक्ति के लिए किले क्षेत्र का निरीक्षण करने या जाने की अनुमति का प्रावधान नहीं था।  डॉ. चक्रवर्ती के साथ केसरी सिंह, हेड कांस्टेबल (मार्च 1938) को रीवा राज्य ने प्रतिनियुक्त किया था। एपिग्राफिया इंडिका XXXI में डॉ. चक्रवर्ती ने बांधवगढ़ के शिलालेखों को प्रकाशित किया है तथा डॉ. मिराशी ने कलचुरी-चेदि युग के शिलालेख में बांधवगढ़ के नागरी शिलालेख को भी प्रकाशित किया है।

हाल ही साल 2020 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जबलपुर मण्डल की स्थापना हुई, जिसके बाद इस बात पर जोर दिया गया कि बांधवगढ़ वन क्षेत्र में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में अधो हस्ताक्षरकर्ता डॉ. शिवाकान्त बाजपेई, अधीक्षण पुरातत्वविद, जबलपुर मण्डल के निर्देशन में निम्नानुसार सर्वेक्षण दल का गठन किया गया। 


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