कलंगी और तुर्रा सेना के बीच हुआ युद्ध
- फोटो : अमर उजाला
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कोरोना काल के दो साल बाद एक बार फिर इंदौर के समीप गौतमपुरा में बुधवार को पारंपरिक हिंगोट युद्ध खेला गया। गांव की इस अनूठी परंपरा के साक्षी हजारों ग्रामीण बने। गौतमपुरा-रूणजी गांव की कलंगी और तुर्रा टीमें आमने-सामने थीं। सूरज के डूबते ही दोनों टीमें गांव के देवनारायण मंदिर में दर्शन के लिए पहुंची। फिर युद्ध के मैदान में नजर आईं।
बता दें कि तरकश में हिंगोट भरे थे। एक हाथ में हिंगोट से बचने के लिए लकड़ी की ढाले थे। जलते हिंगोट जानलेवा साबित न हों, इसलिए ज्यादातर योद्धा सिर पर साफा पहने हुए थे। युद्ध की शुरुआत होते ही एक दूसरे पर आग में जलते हिंगोट फेंके गए। हिंगोट के कारण कुछ योद्धाओं को मामूली चोटें आईं।
आग के कुछ गोले दर्शक दीर्घा में भी पहुंचे, हालांकि कोई घायल नहीं हुआ। दर्शकों को हिंगोट से बचाने के लिए प्रशासन ने लोहे की जालियां लगाई थीं। यह युद्ध करीब एक घंटे तक चला। इस युद्ध में किसी की हार नहीं हुई, बस परंपरा का निर्वाह होने से दोनों टीमों ने ग्रामीणों का दिल जीत लिया। युद्ध खत्म होने के बाद कलंगी और तुर्रा के योद्धाओं ने आपस में गले मिले और फिर अपने-अपने घरों की तरफ लौट गए।
सप्ताह भर से तैयार हो रहे थे हिंगोट...
दोनों गांवों में युद्ध की तैयारी सप्ताह भर पहले से हो रही थी। ग्रामीण देवेंद्र पाटीदार ने बताया, डिंगोरिया नामक पेड़ के फल तोड़कर उसे हिंगोट का रूप दिया जाता है। पेड़ के फल का आवरण कड़क होता है। फल का गुदा निकालकर उसमें बारुद भरा जाता है औ फिर लकड़ी लगाकर पैकिंग की जाती है। एक छोटे छेद में बत्ती लगाते हैं। आ लगते ही यह हिंगोट राकेट की तरह छूटते हैं। हिंगोट युद्ध देखने के लिए आसपास के गांवों के ग्रामीण भी बड़ी संख्या में पहुंचे। उनके स्वागत के लिए गांव में जगह-जगह होर्डिंग भी लगाए गए थे।
एक योद्धा घायल... हिंगोट युद्ध में हिंगोट लगने से एक योद्धा घायल हो गया, जिसे उपचार के लिए इंदौर के एमवाय अस्पताल में भेजा गया। हिंगोट युद्ध में कई बार लड़ने वाले घायल हो जाते हैं। इस वजह से दो साल पहले हाई कोर्ट में युद्ध पर रोक लगाने के लिए याचिका भी लगी थी, लेकिन ग्रामीण इस परंपरा को हर साल बरकरार रखना चाहते हैं। दीपावली के दूसरे दिन यह युद्ध गौतमपुरा गांव में खेला जाता है, लेकिन सूर्यग्रहण के कारण दीपावली के तीसरे दिन हिंगोट युद्ध हुआ। देपालपुर विधायक विशाल पटेल, पूर्व विधायक मनोज पटेल और सांची दुग्ध संघ अध्यक्ष मोती सिंह पटेल भी इस युद्ध को देखने पहुंचे।
कैसे शुरू हुआ हिंगोट... हिंगोट युद्ध कैसे शुरू हुआ और यह परंपरा में कैसे तब्दील हुआ, इसका प्रमाण तो किसी के पास नहीं। लेकिन कहा जाता है कि हिंगोट स्वाभिमान का प्रतीक है। ये परंपरा मुगलों और मराठों से जमाने से चली आ रही है। उस समय लूटपाट के अलावा मुगल सेनाएं हाथियारों के साथ क्षेत्र में आती थीं। मराठा हिंगोट के गोले दागकर मुगल सेना से लड़ा करते थे। यह एक तरीके का गुरिल्ला वार हुआ करता था। तब से दोनों गांवों के बीच में प्रतीकात्मक युद्ध होता है, ताकि लड़ाके अपने हुनर को न भूले।
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कोरोना काल के दो साल बाद एक बार फिर इंदौर के समीप गौतमपुरा में बुधवार को पारंपरिक हिंगोट युद्ध खेला गया। गांव की इस अनूठी परंपरा के साक्षी हजारों ग्रामीण बने। गौतमपुरा-रूणजी गांव की कलंगी और तुर्रा टीमें आमने-सामने थीं। सूरज के डूबते ही दोनों टीमें गांव के देवनारायण मंदिर में दर्शन के लिए पहुंची। फिर युद्ध के मैदान में नजर आईं।
बता दें कि तरकश में हिंगोट भरे थे। एक हाथ में हिंगोट से बचने के लिए लकड़ी की ढाले थे। जलते हिंगोट जानलेवा साबित न हों, इसलिए ज्यादातर योद्धा सिर पर साफा पहने हुए थे। युद्ध की शुरुआत होते ही एक दूसरे पर आग में जलते हिंगोट फेंके गए। हिंगोट के कारण कुछ योद्धाओं को मामूली चोटें आईं।
आग के कुछ गोले दर्शक दीर्घा में भी पहुंचे, हालांकि कोई घायल नहीं हुआ। दर्शकों को हिंगोट से बचाने के लिए प्रशासन ने लोहे की जालियां लगाई थीं। यह युद्ध करीब एक घंटे तक चला। इस युद्ध में किसी की हार नहीं हुई, बस परंपरा का निर्वाह होने से दोनों टीमों ने ग्रामीणों का दिल जीत लिया। युद्ध खत्म होने के बाद कलंगी और तुर्रा के योद्धाओं ने आपस में गले मिले और फिर अपने-अपने घरों की तरफ लौट गए।