कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव दिलचस्प होता जा रहा है। अब सामने आया है कि दिग्विजय सिंह भी कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे। दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष पद का नामांकन फॉर्म ले लिया है। दिग्विजय सिंह से पहले मप्र से शंकरदयाल शर्मा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। अगर दिग्विजय सिंह बनते है तो वह प्रदेश से दूसरे राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे! दिग्विजय सिंह को कभी राहुल गांधी का गुरु माना जाता था।
इससे पहले तक कांग्रेस मुखिया के चुनाव की रेस में शशि थरूर और अशोक गहलोत का नाम सामने आ रहा था। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस पार्टी के भीतर मचे बवाल के बाद अशोक गहलोत ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। दूसरी तरफ शशि थरूर की उम्मीदवार पक्की मानी जा रही है। वह 30 सितंबर को कांग्रेस अध्यक्ष पद चुनाव के लिए नामांकन करने वाले हैं। वैसे चुनाव के लिए जितने भी उम्मीदवार होंगे, सब 30 सितंबर को ही नामांकन कर पाएंगे। क्योंकि चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर मधुसूदन मिस्त्री दिल्ली में नहीं हैं।
दिग्विजय सिंह का पलड़ा कितना भारी?
दिग्विजय सिंह के पास लंबा संगठनात्मक और प्रशासनिक अनुभव है। वह दो बार मध्यप्रदेश के सीएम रहे हैं। उनकी गिनती गांधी परिवार के वफादारों में होती है। कांग्रेस फिलहाल संघ और उनके हिंदुत्व के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। इन्हीं के खिलाफ दिग्विजय सिंह भी लंबे वक्त से मुखर होकर बात करते रहे हैं।
खामियों की बात करें तो साल 2019 में दिग्विजय सिंह खुद भोपाल से चुनाव हार गए थे। बयानों की उनकी मुखरता कुछ मौकों पर बैक फायर भी कर देती है, जिससे पार्टी को भी कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। परिवारवाद के आरोपों का सामना भी दिग्विजय कर चुके हैं। उन पर बेटे और भाई को राजनीति में सेट करने के आरोप लगते रहे।
ऐसा रहा दिग्विजय सिंह का राजनीतिक सफर
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक ऐसे राजनेता हैं, जो अक्सर ही कभी अपनी पर्सनल तो कभी प्रोफेशनल लाइफ को लेकर चर्चा में बने रहे हैं। दिग्विजय सिंह पर अक्सर ही आरोपों की बारिश होती रही है, लेकिन उन पर इन आरोपों का असर न के बराबर ही रहा। उनके बारे में यह भी कहा जाता है उन्हें जो करना है, वह करते हैं। वह इसके लिए पार्टी में किसी की अनुमति का इंतजार नहीं करते। मुख्यमंत्री रहने के दौरान दिग्विजय सिंह कभी जनेऊ पहने तो कभी पूजा अर्चना में व्यस्त नजर आए। कभी संघ को आड़े हाथों लेते दिखाई देते नजर आए।
दिग्विजय सिंह जीवन परिचय
28 फरवरी 1947 को मध्यप्रदेश के इंदौर में जन्में दिग्विजय सिंह ने डेली कॉलेज से मैकिनकल इंजीनियरिंग से स्नातक करने के बाद इन्होंने श्री गोविंददास सेकरसरिया प्रोद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान इंदौर में दाखिला लिया। उनके पिता बलभद्र सिंह राघौगढ़ के राजा थे। राघौगढ़ ग्वालियर स्टेट के अधीन था, दिग्विजय सिंह की पहली शादी आशा दिग्विजय सिंह से हुई, जिससे उनकी दो बेटियां और एक बेटा है। लेकिन साल 2013 में उनकी पत्नी का कैंसर के चलते निधन हो गया, जिसके बाद उन्होंने 2015 राज्यसभा टीवी की एंकर अमृता राय से विवाह कर लिया। जब उन्होंने विवाह किया तब उनकी उम्र 68 साल थी, उनकी नई पत्नी अमृता सिंह 44 वर्षी की थी। शादी के बाद उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन अपनी मर्जी के मालिक कहे जाने वाले दिग्विजय सिंह को इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ा।
दिग्विजय सिंह का राजनीतिक करियर
दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राघोगढ़ नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष के रूप में की। इसी बीच उन्होंने साल 1970 में कांग्रेस का साथ पकड़ लिया औऱ पार्टी से जुड़कर इसके लिए काम करने का फैसला लिया। इस बीच साल 1977 में वह मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में खड़े हुए और राघोगढ़ से विधायक चुने गए। इस दौरान उन्होंने कैबिनेट मंत्री के रूप में कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और सिंचाई क्षेत्र का विकास किया।
साल 1984 में लोकसभा चुनाव में राजगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से सांसद के रूप में चुने जाने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश की कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन इसके बाद साल 1989 में उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र से हाथ धोना पड़ा। साल 1993 में वे फिर से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और उन्होंने इसमें जीत भी हासिल की। इस दौरान दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री पदभार संभालने का भी मौका मिला।
साल 1998 में हुए चुनाव में सिंह को फिर से मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और साल 2003 तक उन्होंने इस पद को संभाला। हालांकि, इसके बाद के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे।
दस साल तक ठसक के साथ राज
दिग्विजय सिंह साल 1993 में पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। साल 1998 का चुनाव भी उन्होंने पूरी ठसक के साथ जीता और दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। साल 2003 का चुनाव कांग्रेस हार गई और दिग्विजय सिंह ने संकल्प लिया था कि यदि पार्टी, चुनाव हार गई तो वह कोई पद नहीं लेंगे।
दिग्विजय सिंह ने अपनी तरफ से इसकी पूरी कोशिश की। राजनीति की कुछ बारीकियां उन्होंने प्रदेश के दिवंगत नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से सीखी हैं। साल 1980 में अर्जुन सिंह की सरकार में वह मंत्री भी बने थे।
सिंह की सबसे बड़ी खासियत है कि वह किसी के नाराज हो जाने की बहुत परवाह नहीं करते। इसके अलावा वह होमवर्क पर पूरा भरोसा रखते हैं। राजनीति में भी उनके पास एक टीम है। यह टीम हमेशा विभिन्न मुद्दों पर काम करती रहती है। दिग्विजय सिंह के एक पुराने दफ्तरी के मुताबिक वह लगातार फीडबैक लेते रहते हैं। याद्दाश्त के बारे में भी कहा जाता है कि वह जिसका एक बार चेहरा देख लेते हैं, उसे काफी हद तक स्कैन कर लेते हैं।
कभी राहुल गांधी के गुरु थे
कांग्रेस में कभी दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी का गुरु माना जाता था। दस साल तक राहुल के काफी करीब रहे थे। पार्टी मुख्यालय में भी दिग्विजय सिंह का अपना गुट था। वह पार्टी के तब सबसे ताकतवर नेता अहमद पटेल की टीम को भी एक सीमा तक ही भाव देते थे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिग्विजय सिंह का समीकरण काफी समय तक रहस्य जैसा बना रहा।
दोस्त भले न दिखें, दुश्मन सामने रहते हैं
दिग्विजय सिंह के दोस्त हर राजनीतिक दल में हैं। उनकी राजनाथ सिंह और समाजवादी पार्टी के नेता रहे अमर सिंह से भी ठीक-ठाक बनती है। लेकिन जरूरत पड़ने पर दिग्विजय राजनीतिक रूप से इन्हें धोने में पीछे नहीं रहते। इसलिए यह जान पाना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह का दोस्त कौन है। यह दिग्विजय सिंह के तिलिस्मी व्यक्तित्व के कारण है।